जीवन में हमें जो कुछ भी मिला है उसके लिए हमें सदा आभारी होना चाहिए

संसार रूपी कर्म भूमि पर जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन यापन के लिए परिश्रम करते हुए अनेक स्थानों का भ्रमण करता है, आजीविका के साधनों को जुटाता है लेकिन उसके बाद भी धन संपत्ति जुटाने की उसकी इच्छा शांत नहीं होती है। मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो जीवन भर ज्ञानार्जन एवं धनार्जन की तलाश में लगा रहता है उसका मन सांसरिक वस्तुओं से बाहर नहीं निकल पाता है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है-

चंचलम् हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।

अर्थात् मन बड़ा चंचल हैं, प्रमथन स्वभाव वाला बड़ा दृढ़ और बलवान है इसलिए उसको वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन है। मन का संतोष ही मनुष्य को सदा प्रसन्न रखता है। जो लोग दूसरों के धन के लालच में अपनी बुद्धि लगाने में लगे रहते हैं, उनकी तृष्णा कभी शांत नहीं होती है।  

जिस प्रकार सूर्योदय और सूर्यास्त प्रकृति का नियम है, उसी प्रकार सुख-दुख, लाभ-हानि का जीवन में आना- जाना लगा रहता है जिसके बिना जीवन रूपी वृक्ष अधूरा है। इसलिए जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को देखकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है, अतः इनसे संघर्ष करने में ही मनुष्य जीवन की सुंदरता है। हमें जीवन में सदा आशावादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, यश, मान-सम्मान, धन-दौलत, के पीछे मनुष्य जितना दौड़ता है, उतना ही भटकता रहता है। जीवन में बड़प्पन का अहसास भ्रम के समान झूठा होता है। जैसे रेगिस्तान में पानी के भ्रम में हिरण भटकता रहता है वैसे ही मनुष्य इसके पीछे परेशान हो कर भटकता रहता है। मनुष्य को कभी यह नहीं भूलना चाहिए हर सुख भरी चाँदनी रात के पीछे दुख भरी काली रात भी छिपी रहती है। मनष्य को सदा अतीत की यादों एवं सुख की कल्पना में ही नहीं दुबे रहना चाहिए; जीवन की चुनोतियों को स्वीकार कर उनका सामना करना चाहिए, जो प्राप्त है उसे संवारते हुए खुश रहकर ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। 

डॉo के एन जोशी

पी जी टी हिन्दी

Share Button

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *