॥ धर्मो रक्षति रक्षित: ॥
BY ADMIN PUBLISHED August 27, 2022, UPDATED January 13, 2023
जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।

‘मिलकर प्रेम से रहने की ऊर्जा प्रदान करता है धर्म’ मान लिया –परंतु आखिर धर्म है क्या ? तो इसका शाब्दिक उत्तर है – तुम्हारे जीवन को जो धारण किए हुए है ,या तुम जिसे धारण किए हुए हो वही तो धर्म है और यही धर्म ही तुम्हारे जीवन का धारक है जैसे मछली के जीवन का धारक है पानी ,वैसे ही जीवन का धारक है धर्म । जिस दिन धर्म से अलग हुए उसी दिन मौत निश्चित मानो क्योकि जिस दिन धर्म तुमसे चला गया उस दिन तुम इंसान नहीं रह सकते ,धर्म अगर साथ है तो सब कुछ तुम्हारे साथ है इसीलिए तो कहा गया है ‘धर्मो रक्षति रक्षित:’ । अर्थात् धर्म की जो रक्षा करता है ,धर्म भी उसकी रक्षा करता है अत: मनुष्य का एक ही मित्र है धर्म ,जो सदैव उसके साथ रहता है ,मनुष्य के जितने मित्र रहतें हैं ,ज्यादा से ज्यादा श्मशान तक पहुंचा देते हैं ,चिता में आग लगा देते हैं और चले जाते है केवल धर्म ही है जो आखिर तक साथ जाता है । जब मनुष्य धर्म के पथ पर चलता है और उससे प्रेरित होकर आध्यात्मिक साधना करता है तो उसके मन का विस्तार होता है । तब उसमे विश्लेषण की भावना नहीं रहती बल्कि संश्लेषण यानि सबको एकसाथ मिलाकर आगे बढ्ने की इच्छा उसके मन में होती है । यही है धर्म का विस्तार मार्ग । धर्म कभी अनुचित व्यवहार नहीं सीखाएगा । धर्म उदार होगा क्योकि भगवान के लिए सब अपने हैं, कोई पराया नहीं ।

इसलिए धर्म विभेद नहीं सीखाएगा धर्म की वाणी सुनो तो भगवान से सीखोगे ,जो बात भगवान के माध्यम से कही गई है ,वही भगवद्गीता है, और इसी गीता में धर्म की ग्लानि की बात कही गई है , यहाँ प्रश्न उठता है की ग्लानि किसे कहतें हैं ? वस्तु की जो स्वाभाविक अवस्था है ,उससे जब वस्तु गिर जाती है या गिराई जाती है तो उसे ग्लानि कहतें हैं जैसे टोपी के लिए स्वाभाविक जगह है सिर ,और सिर की जगह यदि टोपी को पैर पर रख दिया गया ,तो टोपी की ग्लानि हुई । स्मरण रहे की धर्म को हर हाल में मान्यता देनी ही होगी क्योकि जब जीव धर्म को मान्यता नहीं देतें हैं और धर्म के सामने किसी और को मान्यता देतें हैं तो समझ लीजिये धर्म की हानि अर्थात् ग्लानि होना निश्चित है और इसी ग्लानि से ही हमें अपने धर्म की रक्षा करनी है ।
इस संसार में सब कुछ परमात्मा का बनाया हुआ है । एक चींटी से लेकर हाथी तक उसी परमेश्वर ने बनाया है ,जब सब कुछ उनही परमात्मा का बनाया हुआ है ,तो जितनी भी वस्तुएँ हैं ,सब उन्ही का अवतार हैं ,तो छोटे बड़े का सवाल ही नहीं उठ सकता क्योकि जो परमात्मा को जानता है वो जानता है की दुनिया में जितने इंसान हैं सब भाई भाई के रिश्ते से बन्धे हैं । ऐसे में जब समाज की हालत ओर भी बिगड़ जाती है तो उस अवस्था में धर्म के उत्थान के लिए मनुष्य का , भक्तों का और जीवों का काम होता है भगवान के काम में हाथ बढ़ाना । इसलिए धर्म विस्तार का मार्ग ही है जो सबको मिलजुलकर रहने की प्रेरणा और ईश्वर के प्रति समर्पित भाव रखकर आगे बढने की ऊर्जा प्रदान करता है ।
